प्रभु भोग का फल (Prabhu Bhog Ka Phal) – हमारे शास्त्रों मे यह लिखा है की हम जब कभी भी हमारे घर मे भोजन बनाते है उसका सबसे पहला भोग भगवान को लगाना होता है। यह विधान है। लेकिन इसके पीछे क्या कारण है कोनसी कथा छूपी हुई है यह आपको इस लघु कथा “प्रभु भोगा का फल” के माध्यम से पता चलेगा।
एक नगर मे एक बड़ा ही कंजूस शेठ रहा करता था। एक दिन वो अपने पुत्र को अपनी किराने की दुकान पर बिठा कर कंही जाने को निकला और अपने बेटे से कहने लगा – “देख बेटा, अगर कोई भी दुकान से कुछ लेने आये तो बिना मुद्रा लीये कुछ भी मत देना.. मे बस थोड़ी देर मे वापस आ रहा हूं..!!!”

जैसे ही शेठ दुकान छोड़ कर गया की कुची समय बाद एक संत उसकी दुकान पर भोजन सामग्री लेने आये। वो हर दुकान से एक एक द्रव्य लेके अपना भोजन बना कर भगवान को भोग लगाते थे और फिर प्रसाद के रूप मे उसे ग्रहण करते थे। संत ने दुकान पर आ के शेठ के पुत्र से “नमक” माँगा। शेठ के पुत्र ने एक डिब्बा खोला और उसमे से सफ़ेद द्रव्य नमक समझ के संत को दे दिया। संत उसे अपनी झोली मे डाल कर वहा से चले गये।
कुछ देर बाद शेठ वापस से अपनी दुकान पर आया। उसने एक डिब्बा खुला हुआ देखा और अपने पुत्र से पूछा की – “अरे वाह बेटा..!! कौन आया था दुकान पर और तूने क्या बेचा..!!!”
पुत्र ने कहा – “है पिताजी..!!! अभी कुछ देर पहले नदी के किनारे कुटिया बना कर रहने वाले एक संत आये थे जो मुजसे भोजन बनाने के लीये नमक ले कर गये।”
पुत्र के वचन सुन कर शेठ गभरा गया और बोला – “अरे मुर्ख…!!! तूने जो संत को दिया है वो नमक नहीं है वो एक जहरीला पदार्थ था। जिससे शायद उनकी तबियत बिगड़ सकती है।”
अब शेठ शीघ्र नदी किनारे संत की कुटिया की और दौड़े दौड़े जा पहुंचे। जब उन्होंने संत को देखा तो उन्होंने भोजन बना कर भगवान को भोग भी लगा दिया था। उन्होंने आवाज़ लगा कर उन्हें भोजन ग्रहण करने से रोका – “रुक जाइये है संत महात्मा..!! यह भोजन ग्रहण ना करें इसमे आपने गलती से एक जहरीला द्रव्य डाल दिया है। आप मेरी दुकान पर नमक मांगने आये थे किन्तु मेरे पुत्र ने आपको नमक की जगा एक जहरीला द्रव्य आपको दे दिया था। अतः आप इस भोजन को ग्रहण ना करें..!!! आप बीमार पड़ सकते है।”
संत ने कहा – “है भाई..!!! अब तो हम प्रसाद जरूर ग्रहण करेंगे। क्योंकि हमने अभी अभी भगवान को भोग लगा दिया है। अब अगर हम यह भोजन ग्रहण नहीं करेंगे तो यह भगवान के भोग का अनादर होगा। अतः मुझे यह भोग प्रसाद ग्रहण करना ही होगा। अगर सच मे इसमे जहरीला द्रव्य है तो भगवान खुद मेरी रक्षा करेंगे। ऐसा बोलते ही उन्होंने भोजन शुरू कर दिया।”
उनको भोजन ग्रहण करते देख शेठ के होश उड़ गये। उन्हें लगा की अगर इस संत की तबियत बिगड़ी तो कोई तो उनके पास रहना चाहिये जो बैध को बुला कर लेके आये। अतः वो भी वही रुक गये। पूरा दिन बीत गया और रात्रि हो गई। शेठ वंही पर सो गये।
प्रातः शेठ जी जल्दी उठ गये और उन्होंने देखा की संत महात्मा नदी मे स्नान करके आ रहे थे। संत महत्मा को स्वस्थ देख कर शेठजी दंग रह गये।
शेठजी ने उन्हें पूछा – “है महात्मा, आपकी तबियत तो ठीक है ना..!!”
उत्तर मे संत ने कहा – “जैसी प्रभु की इच्छा..!! अब संत महत्मा ने मंदिर के कपाट खोले तो विचलित हो कर वंही पर गिर गये। उन्होंने देखा की भगवान की मूर्ति दो भाग मे बट गई थी और देह काला पड़ गया था।
यह चमत्कार देख कर अब शेठजी को ज्ञात हो गया था की संत के अटूट विश्वास के कारण भगवान ने भोग के रूप मे भोजन का पूरा जहर स्वयं ग्रहण कर लिया था और अपने भक्त को प्रसाद का भोग करवाया था।
अब शेठजी अपने घर वापस आये और अपने पुत्र को घर और दुकान सौप कर भक्तिमार्ग की और बढ़ चले, वो उसी संत महात्मा की शरण मे चले गये। इसलिए कहा जाता है हर रोज भगवान को प्रेम से भोजन का भोग लगा कर ही भोजन ग्रहण करें, सच मे भोजन अमृतमय बन जाता है। अतः आप सब से यह निवेदन है की बिना भोग लगाये भोजन ग्रहण ना करें।







