अधिक मास संकष्टी चतुर्थी कब है? (Adhik Maas Sankashti Chaturthi Kab Hai?)
अधिक मास संकष्टी गणेश चतुर्थी इस साल 03 जून 2026, बुधवार को है।
अधिक मास संकष्टी चतुर्थी चंद्रोदय समय (Adhik Maas Sankashti Chaturthi Chandroday Samay)
अधिक मास संकष्टी गणेश चतुर्थी चंद्रोदय का समय 05 फरवरी 2026, गुरूवार को रात्रि के 09 बजकर 59 मिनट (09:59 PM) पर है।
अधिक मास संकष्टी गणेश चतुर्थी तिथि (Adhik Maas Sankashti Ganesh Chaturthi Tithi)
प्रारंभ – 03 जून 2026 बुधवार को रात 09 बजकर 21 मिनट (09:21 PM) से
समाप्त – 04 जून 2026 गुरूवार को रात 11 बजकर 30 मिनट (11:30 PM) तक

हमारी हिन्दू संस्कृति मे अधिक मास का एक विशिष्ट महत्त्व होता है। इस मास को हमारे हिन्दू धर्म ग्रंथो मे अलग अलग नामो से भी दर्शाया गया है। इस मास को “पुरुषोत्तम मास” या “मल मास” भी कहा जाता है। हमारी पौराणिक सभ्यता के अनुसार यह मास भगवान श्री हरी विष्णु के अति निकट बताया गया है। जिसके चलाते इस मास मे किये जाने वाले पुण्य कर्मो का फल अन्य माह मे किये जाने वाले पुण्य कर्म से कई अधिक मिलता है। इस माह मे आने वाली संकष्टी चतुर्थी का भी एक विशेष महत्व है। इस माह मे आनेवाली संकष्टी चतुर्थी को “विभुवन चतुर्थी” (Adhik Maas Sankashti Chaturthi) के नाम से जाना जाता है। जो भी गणेश भक्त संकष्टी व्रत का अनुष्ठान करता है उसे इस व्रत की कथा का पठन करना अनिवार्य है तभी इस व्रत को करने का पुण्य फल प्राप्त होता है। इस व्रत मे हर गणेश भक्त पूरा दिन निराहार रह कर रात्रि मे चंद्र दर्शन कर के अपने उपवास को तोड़ता है। इस व्रत मे संकष्टी का अर्थ होता है “कष्टों से मुक्ति” अतः जो भी गणेश भक्त पुरे श्रद्धाभाव से इस गणेश संकष्टी चतुर्थी का व्रत करता है भगवान श्री गणेश उसके सारे कष्ट हर लेते है। इस पवित्र अधिक मास मे आने वाली संकष्टी चतुर्थी (Adhik Maas Sankashti Chaturthi) की कथा कुछ इस प्रकार है –
अधिक मास संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा (Adhik Maas Sankat Chaturthi Vrat Katha)
अधिक मास मे आनेवाली इस पवित्र संकष्टी चतुर्थी की कथा सतयुग काल से चली आ रही है। कहा जाता है इस व्रत की कथा द्वापर युग मे पांचाली द्रौपदी को महर्षि वेद व्यास ने सुनाई थी। एक समय की बात है जब कुरुवंश के संरक्षक ऋषि, पांडवो के वनवास काल के दौरान उनसे मिलने उनके आश्रम मे आये हुए थे। तब पांचाली द्रौपदी, की जिन्हे दूशासन ने भरी सभा मे निर्वस्त्र किया और दुर्योधन ने उसे अपमानित किया था, यह सोच कर हैरान थी उनसे ऐसा कोनसा पाप हुआ था जिसके कारण उन्हें यह अपमान सहन करना पड़ा। तब महर्षि ने उत्तर मे उन्हें राजा चन्द्रसेन और रानी रत्नावली की कथा सुनाई थी।
महर्षि ने कथा का आरम्भ करते हुए कहा – एक समय की बात है, जब राजा चंद्रसेन अपनी भार्या रत्नावली के साथ सुखमय जीवन व्यतीत कर रहे थे। उनके राज्य मे चारो ओर खुशहाली और पवित्रता छलक रही थी। किन्तु उनके शत्रु और राज्य लोलुप सम्राटो को उनकी यह खुशहाली रास न आई। एक दिन राजा चन्द्रसेन के शत्रुओ ने उनके राज्य पर आक्रमण किया और उनका सर्वस्व छीन लिया। राजा चन्द्रसेन और रानी रत्नावाली को अपनी सुरक्षा हेतु अपना राज्य त्याग कर वन मे शरण लेनी पड़ी। दोनों अब अपना जीवन निर्वाह करने के लिए वन मे मारे मारे फिरने लगे। एक दिन दोनों को पानी की प्यास लगी, प्यास से व्याकुल हो कर वो वन मे भटक रहे थे। भटकते भटकते वो अनायास एक ऋषि के आश्रम मे जा पहुंचे। वो आश्रम महर्षि मार्कण्डेय ऋषि का था। इतने घने जंगल के बिच मे जब वे दोनों इस स्थान पर पहुंचे तो उनको परम शांति की अनुभूति हुई, उन्हें ऐसा लगा जैसे इस स्थान पर आने के बाद उनकी सुधा तृप्त हो गई हो। जब उन्हें इस स्थान के बारे मे ज्ञात हुआ तब तो बिना किसी विलब के महर्षि मार्कण्डेय के समक्ष जा पहुंचे और उनके समक्ष नतमस्तक हो कर अपने इस कष्ट रूपी जीवन से मुक्ति पाने का उपाय मांगने लगे। महर्षि ने उन्हें आशीर्वाद दिया और उनसे अपनी इस दुर्दशा का कारण पूछा। राजा और रानी ने उन्हें सारी बात कह सुनाई। राजा को भी द्रौपदी की तरह संदेह हो रहा था की उनसे ऐसा कोनसा पाप हुआ है जिसके चलते उन्हें यह कष्ट भोगाना पड़ रहा है।
अगर आप एक विष्णु भक्त है और हर मास में आने वाली पवित्र एकादशी का व्रत करते है तो इस पवित्र अधिक मास में आने वाली परमा एकादशी व्रत कथा जरूर पढ़नी चाहिए…
ऋषि मार्कण्डेय सर्व ज्ञाता थे वो बहुत भविष्य और वर्तमान को भलीभांति देख सकते थे। महर्षि ने ध्यान धरते हुए राजा के पूर्व जन्म के कर्मो को टटोला और उनके प्रश्नों का उत्तर देते हुए कहा – “है राजन..!!! पूर्व जन्म आप एक परम तेजस्वी राजा थे। एक दिन आप आखेद करने जंगल मे गये हुए थे वहां अपने लाल वस्त्र को धारण किये कुछ नाग कन्याओ को व्रत का अनुष्ठान करते हुए देखा था। आप उनसे प्रभावित हो कर उनसे उस व्रत अनुष्ठान के बारे मे पूछने लगे, वो समय अधिक मास का था, उन्होंने बताया की वो सभी भगवान श्री गणेश की संकष्टी चतुर्थी का व्रत कर रही है। इस व्रत को करने मात्र से मनुष्य की सभी समस्याओ का अंत हो जाता है। मनुष्य को अपने कष्टों से सहज़ ही मुक्ति प्राप्त होती है। नाग कन्याओ के मुख से भगवान श्री गणेश की संकष्टी व्रत (Adhik Maas Sankashti Chaturthi) के बारे मे सुन कर उन्होंने भी इस व्रत को करने का मन ही मन निश्चय किया। किन्तु समय जाते वो अपने नाम, यश और कीर्ति की प्राप्ति होने पर इस व्रत का अनुष्ठान करना भूल गये। अपने शक्ति और सत्ता के मद मे वो अहंकारी और अन्यायी राजा बन गये। अपने कुकर्मो के फल स्वरुप उनकी अकाल मृत्यु हो गई थी।
अंततः उन्हें अपने पूर्व जन्म के कुकर्मो के फल भोगने के लिए इस जन्म मे भी एक राजसी परिवार मे जन्म लेना पड़ा। राजा चन्द्रसेन की दुर्दशा का मुख्य कारण उनके पिछले जन्म मे किये हुए उनके कुकर्म ही है जिसके चलते उन्हें इस जन्म मे भी अनेको कष्ट का सामना करना पड़ रहा है।
जब राजा चन्द्रसेन को महर्षि के श्री मुख से अपने पूर्व जन्म के कुकर्मो के बारे मे ज्ञात हुआ, वो पश्चाताप की अनुभूति करने लगे। उन्होंने उसी पल एक संकल्प लिया की वो अपने इस जन्म मे अपने पूर्वजन्म की गलतियों का अनुकरण नहीं करेंगे। अपने पूर्व जन्म मे उन्होंने भगवान श्री गणेश की संकष्टी चतुर्थी का अनादर किया था अतः इस जन्म मे आनेवाली अधिक माह के कृष्ण पक्ष की संकष्टी चतुर्थी (Adhik Maas Sankashti Chaturthi) को दोनों राजा और रानी ने श्रद्धापूर्वक व्रत का अनुष्ठान किया। जिसके फल स्वरुप उन्होंने अपना खोया हुआ राज्य और सन्मान वापस पाया।
अंततः महर्षि वेद व्यास के मुख से अधिक मास संकट चतुर्थी (Adhik Maas Sankashti Chaturthi) की कथा का वर्णन सुनने के बाद रानी द्रौपदी को भी अपने प्रश्नों का उत्तर मिल गया था। सभी उपपस्थित पांडव भी ये बात जान गये थे की उनके दुखो का मूल कारण क्या है। किस कारण से उनको अपना राज्य छोड़ना पड़ा और इतना अपमान सहना पड़ा।
यह अधिक मास संकष्टी चतुर्थी (Adhik Maas Sankashti Chaturthi) की कथा मनुष्य को यह सिखाती है की उनके किये हुए कर्म उनके जीवन की गुणवत्ता निर्धारित करती है। अतः मनुष्य को अगर अपना जीवन सुखमय और शांति से व्यतीत करना है वो सदैव सुकर्म करते रहना चाहिए और कुकर्म और कुसंगत से दूर रहना चाहिए।
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