माँ धुमावती पादुर्भाव कथा (Maa Dhumavati Padurbhav Katha)

माँ धुमावती (Maa Dhumavati) माँ भगवती की दशमहाविद्याओ मे संतावे स्थान पर आती है। माता का यह स्वरुप नकारात्मक है, माँ इस रूप मे मलिन और पुराने वस्त्र धारण की हुई एक विधवा प्रतीत होती है, जिनके केश पूर्णतः अव्यवस्थित है। माँ की सभी महादेव विद्यायो के समान यह भी कोई आभूषण धारण नहीं करती है। माता जा यह स्वरुप अनाकर्षक एवं अशुभ है। माँ इस रूप मे हमेशा भूखी प्यासी और कलह उत्पन्न करने वाली प्रतीत होती है।

माँ धुमावती के इस स्वरुप और स्वभाव की तुलना अलक्ष्मी, नीऋति और देवी जेष्ठा से की जाती है। किन्तु माता के भक्त माता के इस स्वरुप की पूजा अर्चना कुछ विशेष और विभिन्न अवसरो पर किया करते है।

Maa Dhumavati Padurbhav Katha

माँ धुमावती पादुर्भाव कथा (Maa Dhumavati Padurbhav Katha)

पौराणिक कथा के अनुसार एक समय की बात है जब माँ पार्वती को बहोत ही तीव्र भूख लगी थी। उन्होंने अपनी क्षुधा मिटाने के लीये कैलास पर खोज की किन्तु वहां उस समय कोई पर्याप्त भोजन उपलब्ध नहीं था जो माता की क्षुधा को शांत कर सके अतः अंत मे वो भगवान शिव के पास आई और उनसे भोजन की मांग करने लगी। किन्तु भगवान शंकर उस समय अपनी साधना मे लीन थे। माँ पार्वती के बार बार भोजन के लीये पुकार ने पर भी भगवान शंकर अपनी ध्यानमुद्रा से बाहर नहीं आ रहे थे। जिसके चलते माता पार्वती तीव्र क्षुधा के मारे बड़ी व्याकुल हो गई थी।

अब माता पार्वती की क्षुधा धीरे धीरे अति तीव्र होने लगती है। वहा पर्याप्त भोजन ना मिलने के कारण वो एक तीव्र श्वास लेती है जिसके चलते स्वयं भगवान शिव को माता निगल लेती है। भगवान शिव के कंठ मे विष होने के कारण माँ के शरीर से धुंआ निकल ने लगता है, तथा उनका शरीर श्रुगार विहीन और विकृत होने लगता है। तब जाके माँ पार्वती की क्षुधा शांत होती है।

अंतः भगवान शिव अपनी माया संकलित करते है और माँ पार्वती के शरीर से बाहर आते है। अब भगवान शिव माँ पार्वती के धूम से व्याप्त शरीर को देखते है और कहते है – “है देवी, अब से आप इस स्वरुप मे भी पूजी जायेगी।” इस प्रकार से माँ पार्वती का नाम “माँ धुमावती” पड़ा।

माँ धुमावती की मुद्रा (Maa Dhumavati Ki Mudra)

माता धुमावती का यह स्वरुप बड़ा ही अनआकर्षित है, माता के इस स्वरुप मे उनकी दो भुजाये है जिसमे क्रमशः कम्पित हाथो मे एक सूप और दूसरा हाथ वरदान मुद्रा मे है अथवा ज्ञान प्रदायनी मुद्रा मे है। माँ एक बिना अश्व के रथ पर सवार है जिस रथ के शीर्ष पर एक ध्वज एवं प्रतिक के रूप मे एक कौवा सदैव बिराजमान रहता है। धनगोर दरिद्रता और समस्त रोगों से मुक्ति प्राप्त करने हेतु उनके भक्त उनकी पूजा आराधना करते है।

माँ धुमावती मूल मंत्र (Maa Dhumavati Mul Mantra)

ॐ धूं धूं धूमावती देव्यै स्वाहा॥

माँ धूमावती के अन्य मंत्र (Maa Dhumavati Other Mantra)

माँ धुमावती सप्ताक्षर मंत्र (Maa Dhumavati Saptakshar Mantra)

धूं धूमावती स्वाहा॥

माँ धूमावती अष्टक्षर मंत्र (Maa Dhumavati Ashtakshar Mantra)

धूं धूं धूमावती स्वाहा॥

माँ धूमावती दशाक्षर मंत्र (Maa Dhumavati Dashakshar Mantra)

धूं धूं धूं धूमावती स्वाहा॥

माँ धूमावती चतुर्दशाक्षर मंत्र (Maa Dhumavati Chaturdashakshar Mantra)

धूं धूं धुर धुर धूमावती क्रों फट् स्वाहा॥

माँ धूमावती पंचदशाक्षर मंत्र (Maa Dhumavati Panchdashakshar Mantra)

ॐ धूं धूमावती देवदत्त धावति स्वाहा॥

माँ धूमावती गायत्री मंत्र (Maa Dhumavati Gayatri Mantra)

ॐ धूमावत्यै विद्महे संहारिण्यै धीमहि तन्नो धूमा प्रचोदयात्॥

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