प्रभु का पत्र (Prabhu Ka Patra) – भगवान मनुष्य से क्या चाहते है वो इस पत्र के माध्यम से बड़े सहज़ तरीके से दर्शाया गया है। मनुष्य अपने जीवन काल मे हमेशा आपसी संबंधों मे खो कर रह जाता है और अंत तक उसी मे उलजा रहता है किन्तु उसे यह ज्ञात नहीं होता की आखिरकार ईश्वर उससे क्या चाहते है। मनुष्य को इस पृथ्वी पर आखिरकार क्यों भेजा गया है। यह इस पत्र मे आपको साझा किया हुआ है –
मेरे प्रिय,
आज प्रातः तुम जैसे ही अपनी नींद से जागे मै तुम्हारे बिस्तर के पास ही खड़ा हुआ था। मुझे ऐसा आभास हुआ की तुम मुजसे शायद कुछ कहोगे। मुझे लगा की तुम कल या पिछले हफ्ते हुई किसी घटना के बारे मे सोच कर मुझे धन्यवाद कहोगे। लेकिन तुम तो झट से अपना बिस्तर समेटते हुए अपनी गरमा गरम चाय की चुक्सी लेने निकल पड़े और मेरी और देखा तक नहीं। कुछ क्षण बाद तुम नहाने चले गये मुझे लगा की नहाने के बाद तुम मेरे दर्शन करने अपने घर के मंदिर का कपाट जरूर खोलोगे और मेरे सामने नत मस्तक हो कर मेरी प्रार्थना करोगे, लेकिन यहाँ तो तुम इस उलज्जन मे पड़ गये की आज मुझे कोनसे कपडे पहन ने है?
फिर तुम टेबल पर बैठ कर सुबह का नाश्ता ख़त्म कर रहे थे और अपने ऑफिस के जरूरी कागज़ को इकठ्ठा करने हेतु पुरे घर मे यहाँ से वहां दौड़ रहे थे, तब मुझे लगा की शायद हड़बड़ी मुझे तुम जरूर याद करोगे लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।
फिर जब तुम ऑफिस जाने के लीये ट्रैन मे बैठे तब मुझे लगा की अब शायद तुम इस खाली समय मे मुजसे बातचीत करना चाहोगे मुझे मन से याद करोगे। लेकिन यहाँ भी तुम कुछ क्षण अखबार पढ़ने मे लग गये और फिर अपने मोबाइल फ़ोन से खेलने लगे और मे बस वही खड़ा खड़ा तुम्हे ही देख रहा था।

मैं तुम्हे कुछ कहना चाहता था, की अपने दिन का कुछ समय मेरे साथ भी बिताया करो तुम्हारे दिन के सभी काम और अच्छे से होने लगेंगे किन्तु तुमने मुजसे बात ही नहीं की…
मैंने देखा की ऑफिस मे तुम्हारे पास एक ऐसा समय भी आया था की तुम्हारे पास कुछ काम नहीं था तुम पुरे 15 मिनट तक अपनी कुर्सी पर यूँही खाली बैठे हुए थे लेकिन तुमने मुजसे बात की ही नहीं।
दोपहर के समय जब तुम अपने ऑफिस की कैंटीन मे अपना भोजन ग्रहण करने अपनी मैज़ पर बैठे हुए थे तब भी मुझे ऐसा लगा की शायद तुम अब मेरा नाम स्मरण करके अपना भोजन ग्रहण करोगे किन्तु तुमने वहा भी मुझे याद नहीं किया।
दिन का अभी भी बहोत सारा समय शेष बचा हुआ था मेने सोचा की इस समय मे तुम मुझे याद करोगे और मुजसे अपनी बात कहना चाहोगे किन्तु तुम ऑफिस का अपना काम निपटा कर घर आ गये और अपने घर के काम मे व्यस्त हो गये। घर का भी काम निपटा कर तुम अपने सोफे पर बैठ के घंटो तक टीवी देखते रहे लेकिन मुझे ज्यादा करना तुमने जरूरी नहीं समजा। देर रात तक टीवी देखने के बाद थक कर तुम अपने बिस्तर मे जा पहुंचे और अपनी पत्नी और बच्चों को शुभ रात्रि कह कर चादर तान कर सो गये।
मेरा बड़ा मन था की मैं भी तुम्हारी दिनचर्या का एक हिस्सा बनु.. तुम्हारे साथ कुछ समय व्यतीत करू.. तुमसे कुछ सुनु और तुम्हे कुछ सुनाऊ…
मेरा बड़ा मन करता है की तुम्हे मार्गदर्शन दूँ की तुम इस धरती पर किस उद्देश्य से आये हो और किन कामो मे उलजे हुए हो। किन्तु तुम्हे तो इन सब बातो के लीये समय ही नहीं है इस लीये मे अपना मन मार कर बैठ जाता हूं।
मैं तुमसे बहोत स्नेह करता हूं..!!
हर दिन मुझे ऐसा लगता है की तुम मेरा ध्यान करोगे और अपनी छोटी से छोटी खुशियों को मेरे संग बाटोगे और मेरा धन्यवाद करोगे।
किन्तु तुम तभी आते हो जब तुम्हे कुछ पा ने की लालसा होती है। तुम बस अपनी वो लालसा मुझे बताते हो और चले जाते हो। मेरे सामने खड़े हो कर भी तुमने मेरा ध्यान कभी नहीं धरा तुम्हारा पूरा ध्यान वहा उपस्थित लोगो मे ही रहा और मे बस तुम्हारा इंतज़ार ही करता रहा गया।
खैर कोई बात नहीं… क्या पता का तुम्हे मेरी याद आ जाये और तुम्हे मेरे संग बात करने का मन हो जाए..
यह मेरा विश्वास है और मुझे तुममे पूरी आस्था है की एक ना एक दिन तुम मेरा ध्यान जरूर धरोगे और मुजसे बात करोगे। क्योंकि आस्था और विश्वास भी तो मेरे ही अंश है।
तुम्हारा ईश्वर







