सच्चा साधु कौन..!!! एक प्रेरक कहानी (Saccha Sadhu Kaun..!!!)

सच्चा साधु कौन..!! (Saccha Sadhu Kaun..!!) – एक समय की बात है, एक नगर मे एक नाविक एक साधू को हर रोज नदी पार करवाया करता था और बदले मे वो साधु बाबा से कुछ भी नहीं माँगा करता था। वैसे देखा जाये तो एक साधू के पास से क्या ही प्राप्त हो सकता है भला..

नाविक अपने स्वभाव से बहुत ही सरल था वो ज्यादा पढ़ा लिखा तो नहीं था किन्तु उसे अच्छे बुरे की समझ थी।

साधु बाबा अपने स्वभाव के चलते नाविक को पुरे रास्ते मे ज्ञान की बाते किया करते थे कभी उसे भगवान की सर्वव्यापकता के विषय मे बताते और कभी कभी श्री मद भगवत गीता के श्लोक को विस्तार पूर्वक समजाते थे। नाविक मछवारा बाबा की बात को बड़े ही ध्यान से सुना करता और उसे अपने ह्रदय मे बिठा लेता था।

Saccha Sadhu Kaun..!!!

एक बार बाबा नाविक को नदिया पार करने के बाद अपनी कुटिया मे ले गये। वहा जब नाविक पहुंचा तो दंग रह गया, साधु बाबा की इस छोटी सी कुटिया मे उन्होंने काफी मात्रा मे धन संभाले रखा हुआ था। साधु बाबा नाविक को अपने धन की और इशारा करते हुए बोले – “है वत्स, तुम दिल के बड़े ही नेक और सच्चे इंसान हो। मे साधु बनने से पहले एक व्यापारी हुआ करता था मेने काफी मात्रा मे धन अर्जित किया करता था किन्तु महामारी मे दौरान मे अपने पत्नी और बच्चो को नहीं बचा पाया। अब यह धन मेरे किसी काम का नहीं रहा। तुम्हारा एक परिवार है बच्चे है तुम इस धन को ले जाओ तुम्हारी सारी समस्याएं दूर हो जाएगी। तुम्हारा जीवन सवर जायेगा और तुम्हारे परिवार का भी भविष्य बन जाएगा।

साधु बाबा की बात सुन नाविक ने कहा – “है बाबा, आपने इतना मेरे लीये सोचा मे उसका धन्यवाद करता हूँ किन्तु मुझे क्षमा करें मे यह धन नहीं ले सकता। मुफ्त का धन घर मे आ जाते ही घर के सदस्यो का आचरण बिगाड़ देता है। घर मे फिर कोई भी महेनत करना नहीं चाहेगा, सभी लोग अलासी हो जायेंगे, सब मे लालच और लोभ की वृद्धि होने लगेगी। लोग पाप करने लगेंगे।

आपने ही मुझे ईश्वर के बारे मे बताया और मुजमे श्रद्धा जगाई। आजकल तो मुझे इन लहेरो मे भी उन्ही के दर्शन होते है। अगर यह सत्य है की मैं उन्ही की नज़र मे हूँ तो अब मे अविश्वास क्यों करू, तो बस मे अपना कर्म करू और शेष उन पर ही छोड़ दू।

यह प्रसंग तो समाप्त हो गया किन्तु मन मे एक सवाल छोड़ गया। इन दोनों पात्रों मे सच्चा साधु कौन था?

एक वो, जिसने अपने जीवन काल मे दुःख देखा, सन्यास लिया, धर्मग्रंथो का अध्ययन किया, समजा याद किया, अंतः वो अन्य लोगो को धर्म का ज्ञान देने की स्थिति मे भी आ गया, फिर भी धन की ममता ना छोड़ पाया, उसका एक मन उसी धन मे अटका रहा और सुपात्र की खोज करता रहा। और दूसरी ओर वो निर्धन नाविक जिसका जीवन आज सुबह भोजन प्राप्त हो गया और शाम का पता तक नहीं, फिर भी पराये धन के प्रति उसके मन मे कोई लालसा नहीं जगी।

संसार मे लिप्त रहकर भी निरलिप्त रहना उसे आ गया, उसने सन्यास नहीं लिया किन्तु उसे ईश्वरीय सत्ता मे विश्वास हो गया। उस अनपढ़ ने ना कभी श्रीमदभगवत गीता के श्लोक को पढ़ा था किन्तु साधु द्वारा समजाये गये श्लोक को उसे समझने मे देर नहीं लगी, उसने ना केवल उन श्लोक को समजा बल्कि उसने अपने जीवन मे भी उतारा और पल भर मे धन के लोभ को भी ठुकारा दिया। अब आप ही बताइये इन दोनों मे से असली संत कौन था?? इस कथा के अनुसार केवल साधु का वेश धर लेने से कोई साधु या महात्मा नहीं बन जाता किन्तु जो भी मनुष्य अपने जीवन काल मे साधु का आचरण धारण करते हुए जीवन व्यतीत करता है वही सच्चा साधु मना गया है।

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