पाखंडी को परमात्मा नहीं मिलते (Pakhandi Ko Parmatma Nahi Milate)

पाखंडी को परमात्मा नहीं मिलते (Pakhandi Ko Parmatma Nahi Milate) – भगवान श्री कृष्ण के प्रति गोपियों का स्नेह इस कदर बढ़ गया था की वो उनका वियोग एक क्षण भी सह नहीं सकती थी। एक दिन ऐसा आया की गोपिया श्री कृष्ण के वियोग मे मूर्छित  होने लगी।

श्री कृष्ण ने अपने साथी गोपालो को यह आदेश दिया था की जब भी अगर कोई गोपी मूर्छित हो तो वो उन्हें बुला ले, उन्हें मूर्छा उतारने का मंत्र आता है।

अब किसी भी गोपी को मूर्छा आती तो शीघ्र श्री कृष्ण को बुलाया जाता था। श्री कृष्ण यह बात भली भांति जानते थे की इस गोपी के प्राण अब बस मुजमे ही अटके हुए है। इस गोपी के मन मे कोई वासना का भाव नहीं है। अतः श्री कृष्ण उस गोपी के सिर पर हाथ फेरते और उसके कान मे कहते – “है गोपी मे तुम्हे शरद पूर्णिमा की रात्रि को मिलूंगा। तब तक तुम्हे धीरज रखनी होंगी और मेरा ध्यान धरना होगा।” बस इतना सुन कर गोपी की मूर्छा दूर हो जाती थी।

Pakhandi Ko Parmatma Nahi Milate

अब पुरे वृंदावन मे यह बात फ़ैल गई की जब भी किसी गोपी को मूर्छा आती है तब कन्हैया आता है और गोपी के कान मे एक मंत्र बोल कर चला जाता है जिसके बाद गोपी की मूर्छा दूर हो जाती है। वंही वृंदावन मे एक वृद्ध महिला भी रहा करती थी जो की एक गोपी की सास भी थी। वो बड़ी ही चालक और कटु स्वाभाव की थी। उसे वृंदावन मे होने वाले इस चमत्कार मे कुछ गड़बड़ दिखाई दी। उसे लगा मुझे भी देखना है की ऐसा तो क्या वो कान्हा इन गोपीओ की कान मे बोलता है जिससे इनकी मूर्छा सहज़ ही खुल जाती है..!!

अब वृद्धा ने मूर्छित होने का ढोंग किया, वो यह जानना चाहती थी की आखिर कान्हा मेरे कान मे आके कोनसा मंत्र पढ़ता है। एक दिन वो कम करते करते मूर्छित हो कर गिर पड़ी। यह देख गोपी को बड़ा दुख हुआ। वो सीधा दौड़ी दौड़ी कान्हा को बुलाने जा पहुंची।

भगवान श्री कृष्ण तो सब जानते थे इस लीये उन्होंने गोपी से कहा – “सफ़ेद बालो वाली महिला पर मेरा मंत्र काम नहीं करता है। बाल सफ़ेद होने पर भी दिल्ली सफ़ेद ना हो, मन मे प्रभु भजन ना चलते हो तो ऐसा जीव जिए या मरे इससे कोई फरक नहीं पडता है। मै नहीं जाऊंगा तू किसी दूसरे वैध को बुला ले।”

किन्तु गोपी का मन पवित्र था उसने बहोत आग्रह किया की कान्हा बस तेरा ही भरोसा है और किसी पर नहीं अब तुझे ही आना होगा उनकी मूर्छा को दूर करने के लीये। गोपी के निश्छल प्रेम के आगे कृष्ण विवश हो गये और अंततः उन्हें ही जाना पड़ा। वहां जाके उन्होंने देखा की वृद्धा जमीन पर मूर्छित होना का ढोंग कर रही थी। तब कृष्ण ने कहा – “अरे है नवनीत..!!! इन्हे मूर्छा नहीं आई है इन्हे तो भूत  लगा है। किन्तु तू चिंता मत कर मेरे पास भूत भगाने का भी मंत्र है। तू जल्दी से एक लकड़ी ले के आ।

अब वृद्धा घभराई उसे लगा की अब तो मेरा यह ढोंग मुझे ही मार खिलाने वाला है।

भगवान श्री कृष्ण ने लकड़ी के दो-चार फटके मारे की वृद्धा तुरंत उठ खड़ी हुई और बोलने लगी – “मत मारो मुझे.. मुझे मत मारो.. मुझे ना तो मूर्छा आई है नहीं कोई भूत आया है.. मे तो बस नाटक कर रही थी..!!! मुझे देखना था की कान्हा ऐसा तो कोनसा मंत्र पढ़ता है की सभी गोपीओ की मूर्छा दूर हो जाती है। किन्तु अब मुझे कुछ भी जानना नहीं है। मुझे मत मारो.. मुझे जाने दो..!!!”

इस छोटी सी कथा से हमें यह सिख मिलती है की पाखंड भूत है.. अभिमान भूत है… पाखंडी को कभी भी परमात्मा का संग प्राप्त नहीं होता है। परमात्मा का संग पाने के लीये उन पर अटूट श्रद्धा और भक्ति का होना परम आवश्यक है। बिना श्रद्धा और विश्वास के परमात्मा हमें नहीं मिलते।

Leave a Comment