महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग (Shri Mahakaleshwar Jyotirling) भगवान शिव के प्रमुख 12 ज्योतिर्लिंगो में से तीसरे स्थान पर आता है। यह भगवान शिव के अति विशिष्ट निवास स्थानों में से एक है। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग भारत के मध्य प्रदेश राज्य में आये हुए प्राचीन शहर उज्जैन में स्थति है। यह पूरा नगर भगवान शिव को समर्पित है। यह पावन स्थल पवित्र नदी शिप्रा के किनारे बसा हुआ है। लिंगम के रूप मे पिठासिन देवता भगवान शिव को स्वयंभु माना गया है, जो शिव की अन्य छवियों और लिंगो की तुलना में शक्ति की धाराओं को प्राप्त करते है जिन्हे मंत्र शक्ति के स्थान निवेशित और स्थापित किया जाता है।
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की कुछ विशेषताएं
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग भारत से सभी ज्योतिर्लिंगो की तुलना में अधिक प्रतिष्ठित ज्योतिर्लिंग माना गया है। यहाँ माना जाता है की भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग दक्षिणामुखी है जो की एक विशिष्ट बात है। भारत में स्थित सभी ज्योतिर्लिंगो से ये ज्योतिर्लिंग है जो की दक्षिणामुखी है।
महाकालेश्वर मंदिर में प्रतिदिन की जाने वाली भस्म आरती इस मंदिर का एक मुख्य आकर्षण है। यहाँ भस्म आरती सूर्योदय होने से पूर्व की जाती है जँहा भगवान शिव शंकर का श्रुँगार पवित्र राख़/भस्म से किया जाता है। यहाँ भगवान शिव की आरती या पूजा करने से पहले भगवान शिव को विभिन्न घाटों में मंगवाई गई राख़ चढ़ाई जाती है। इस मंदिर में भस्म आरती का हिस्सा बनना अपने आप में एक अनोखा अनुभव प्रदान करता है। भारत में स्थित सभी ज्योतिर्लिंगो में से ये एक मात्र ज्योतिर्लिंग है जँहा भगवान शिव का श्रुँगार भस्म से किया जाता है।

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग वास्तुकला
महाकालेश्वर मदिर का प्रांगन भारत की मराठा, भूमिजा और चालुक्य शैलियो से अति प्रभावित है। यहाँ प्रस्थापित मूर्तियों में आपको इन शैलियो की जहांगी देखने को मिल जाएगी। यहाँ आपको महाकालेश्वर की अद्भुत लिंगम मूर्तियों का संकलन देखने को मिल जायेगा। यहाँ ज्योतिर्लिंग ओम्कारेश्वर और नागेश्वर के शीलालेख और माता पार्वती, पुत्र कार्तिकेय और गणेश के चित्र भी एक आकर्षण का केंद्र बने हुए है। यह पूरा मंदिर पांच स्तरों में फैला हुआ है जंहा महा शिवरात्रि के अवसर पर भक्तो की भरी भेड़ देखने को मिलती है।
इस कुंड के पूर्व भाग में एक विशाल बरामदा आया हुआ है, जंहा गर्भगृह की और जाने वाले मार्ग का प्रवेश द्वार विद्यमान है। उसी मार्ग पर माता पार्वती, गणेश और कार्तिकेय के छोटे छोटे चित्र आपको देखने को मिल जायेंगे। मंदिर के गर्भगृह की छत को ढकने वाली चाँदी की प्लेटे मंदिर की भव्यता में और इजाफा करती है। मंदिर के गर्भ गृह की दीवारे भगवान महाकालेश्वर की स्तुति से अनुक्रित की गई है, यहाँ स्तुति का गठन शाश्त्रोक्त भाषा में किया गया है जो देखने में काफी प्रभावशाली दिखाई देता है। बरामदे के उत्तरी भाग में प्रभु श्री राम और देवी अवन्तिका की छविया बिराजमान है जिनकी हमेशा पूजा की जाती है।
शक्ति पीठ के रूप में महाकालेश्वर मंदिर
भगवान महाकाल का यह मंदिर 18 महा शक्ति पीठो में से एक के रूप में प्रतिष्ठित है। मान्यता है की यहाँ माता सटी का उपरी होठ गिरा हुआ था और यहाँ बिराजमान शक्ति को महाकाली के रूप से संबोधित किया जाता है।
महाकालेश्वर की पौराणिक कथा (Mahakaleshwar Pauranik Katha):
महाकालेश्वर जिनका अर्थ होता है “महा + काल + इश्वर” , जो काल यानी समय की इश्वर है। यह नाम हिन्दू देवता भगवान शिव को पूर्ण रूप से समर्पित है। हिन्दू धर्म की प्रमुख त्रि-मुर्तिया ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर, यहाँ भगवान शिव को महेश्वर के नाम से भी संबोधित किया जाता है। महाकालेश्वर मंदिर में भगवान महाकाल यानी शिव की पूजा आराधना की जाती है, यह मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और ये तीसरे क्रमांक पर आता है।
शिव पुराण की एक कथा के अनुसार उज्जैनी नगरी में चंद्रसेन नामक एक राजा शासन करता था। जो स्वयं एक शिव भक्त था। भगवान शिव के गणों में से एक मणिभद्र से उस राजा की घनिष्ट मित्रता थी। एक दिन की बात है मणिभद्र ने चंद्रसेन को एक अमूल्य चिंतामणि प्रदान किया, वो चिंतामणि इतना प्रभावशाली और तेजस्वी था जिसके चलाते राजा चन्द्रसेन की ख्याति दिन प्रतिदिन बढ़ने लगी, उनकी यश और कीर्ति दूर दूर तक फैलने लगी।
जैसे जैसे चन्द्रसेन के पास रखे उसे चिंतामणि की खबर आस पास के राज्यों के राजा को पता चलाती उनकी मन में इस चिंतामणि को प्राप्त करने की लालासा बढ़ने लगी। इन मेसे कई राजाओ ने चन्द्रसेन पर आक्रमण भी किया, अपनी मृत्यु और चिंतामणि छीन जाने के डर से राजा चन्द्रसेन वहाँ से भाग कर भगवान महाकाल की शरण में आ गया उनकी तपस्या में लीन हो गया। कुछ समय के पश्चात एक विधवा गोपी अपने पांच साल के पुत्र के साथ वहाँ पहोची। बालक प्रतिदिन राजा को शिव भक्ति में लीन होता हुआ देख खुद भी उनसे प्रेरित हो के भगवान शिव के लिंग की पूजा करने लगा।
बालक शिवभक्ति में इस कदर लीन हो गया की उसे उसकी माता की आवाज़ तक नहीं सुनाई दे रही थी। एक दिन माता भोजन के लिये अपने बालक को बुला रही थी किन्तु बालक को उसकी आवाज़ नहीं सुनाई दे रही थी, तब गुस्साई माता उसके पास आई और उसे पीटने लगी, माँ इतना गुस्से में थी की उन्होंने पास रखी भगवान शिव की पूजा सामग्री भी फेंक दी। जब बालक अपनी साधना से बाहर आया और अपनी माता के गुस्से के कारण बिखरी हुई पूजा सामग्री को देखा तो वो बहोत निराश हुआ।
तभी देखते ही देखते वहाँ चमत्कार हुआ। भगवान शिव की कृपा से वहाँ एक भव्य मंदिर का निर्माण हुआ जिसमे एक दिव्य शिवलिंग भी बिराजमान था और उस पर बालक के द्वारा चढ़ाई हुई पूजा सामग्री भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही थी। इस तरह से उज्जैन नगरी में महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति हुई। यह दृश्य देख बालक की माता भी चकित रह गई।
जब राजा चन्द्रसेन को इस बात की सूचना मिली तो वो भी भगवान महाकालेश्वर के दर्शन के लिये तुरंत आ पंहुचा। इतना ही नहीं जो राजा पहले चिंतामणि की लालासा में राजा चन्द्रसेन पर आक्रमण कर रहे थे वे भी महाकाल की शरण में आ गये। इस घटना के बाद से बाबा महाकाल उज्जैनी नगरी में निवास कर रहे है।
प्रमुख त्यौहार:
वैसे तो उज्जैन नगरी में बाबा महाकाल की पूजा अर्चना के साथ साथ बाबा का अभिषेक और आरती पुरे वर्ष नित्य कर्म के अनुसार किये जाते है किन्तु इनाम कुछ अवसर या उत्सव ऐसे होते है जिसे यहाँ विशेष रूप से मनाया जाता है।
महा शिवरात्रि – इस दिन पूरी उज्जैन नगरी भक्तिभाव से विभोर हो उठती है। यहाँ एक बहोत विशाल मेले का आयोजन किया जाता है और रात्रि भर बाबा महाकाल की पूजा चलती है।
सवारी (जुलुस) : भगवान शिव की पवित्र शोभा यात्रा का आयोजन हर सोमवार को एक विशिष्ट समय और अवधि के दौरान किया जाता है जँहा ये शोभा यात्रा उज्जैन की सडको पर एक आकर्षण का केंद्र बनती है।
– यही नहीं भाद्रपद के अँधेरे पखवाड़े में निकलने वाली बाबा की अंतिम सवारी कई शिव भक्तो को आकर्षित करती है और इसे बड़े धूमधाम और शोख से मनाया जाता है।
– विजियादशमी तिथि के अवसर पर निकलने वाली भगवान शिव की शोभा यात्रा का एक अलग ही आकर्षण होता है।
उज्जैन महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग अन्य शहरों से काफी अच्छी तरह से जुडा हुआ है यहाँ यात्रालुओं को आने में कोई असुविधा का सामना नहीं करना पडता है।