श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग पादुर्भाव पौराणिक कथा (Shri Bhimashankar Jyotirling Padurbhav Pauranik Katha)

श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग (Shri Bhimashankar Jyotirling) की कथा का वर्णन शिव पुराण में किया गया है। शिव पुराण के अनुसार पूर्व काल में एक भीम नाम से राक्षस हुआ करता था। वाह राक्षस राक्षसराज कुम्भकरण का पुत्र था। किन्तु उसका जन्म ठीक उसकी पिता की मृत्यु के पश्चात हुआ था अतः उसे अपनी पिता की मृत्यु श्री राम के द्वारा हुई उसका ज्ञात नहीं था। समय बीतता गया और एक दिन उसकी माता के द्वारा उसे अपनी पिता की मृत्यु भगवान श्री राम के हाथो हुई है के बारे में पता चला तब वो भगवान श्री राम का वध करने के लिये बहोत आतुर हो गया।

अपने उद्देश्य को सार्थक बनाने के लिये उसने कई वर्षो तक ब्रह्म देव की तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न हो कर परम पिता ब्रह्मा जी ने उसे विजयी होना का वरदान दिया। वरदान पाने के साथ ही उसने चारो और उत्पात मचाना शुरू कर दिया। उससे केवल मनुष्य ही नहीं देवी देवता भी भयभीत रहने लगे।

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धीरे धीरे चारो लोक में उसके आतंक की चर्चा होने लगी थी। अब वो देवताओं को भी परास्त करने लगा था।

वो जँहा कही भी जाता मृत्यु का तांडव मचने लगता। उसने अपने भय से सभी जगा पूजा पाठ और पुण्य कर्म बंध करवा दिये थे। सभी देवता गण उसके अत्याचार से त्रस्त हो के भगवान शिव की शरण में चले गये।

भगवान शिव ने सभी देवतागण को आश्वस्थ करवाया की वे इस समस्या का हल जरूर निकालेंगे। जब राक्षराज भीम को इसकी सूचना मिली उसने भगवान शिव को युद्ध के लिये ललकारा। भगवान शिव और भीम के बिच में एक घमासान युद्ध हुआ और अंत में भगवान शिव ने राक्षसराज  भीम का वध कर दिया। जिस स्थान पर भगवान शिव ने भीम राक्षस का वध किया था उस स्थान पर सभी देवता ने भगवान शिव को ज्योतिर्लिंग के स्वरुप में बिराजमान होने के लिये कहा। सभी देवतागण का मान रखते हुए भगवान शिव ने वहाँ लिंग के रूप में बिराजित होना स्वीकारा। तब वो “भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग” (Bhimashankar Jyotirling) के नाम से प्रसिद्ध हुए।

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