श्री बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग पादुर्भाव कथा (Shri Baidyanath Jyotirling Padurbhav Katha)

श्री बैधनाथ ज्योतिर्लिंग (Shri Baidyanath Jyotirling) भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। इस ज्योतिर्लिंग की महिमा अतिविशिष्ट है। इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन मात्र से भक्त की समस्त पीड़ा का निवारण हो जाता है। इस ज्योतिर्लिंग की पादुर्भाव कथा का वर्णन शिव पुराण में कुछ इस प्रकार से किया गया है।

श्री बैद्यनाथ महादेव की कथा:

एक समय की बात है जब राक्षसराज रावणने हिमालय पर्वत पर जाके भगवान शिव की घोर तपस्या की। तपस्या मे राक्षसराज ने एक – एक करके अपने शीश नौव बार भगवान शंकर को अर्पण कर दिए और जब वो दसवीं बार अपना शिव भगवान शंकर को चढ़ाने ही वाला था तब तक भगवान शंकर उस पर प्रसन्न हो उठे। भगवान शिव ने राक्षसराज रावण को दर्शन दिए और उसके सभी कटे हुए शीश को पहले के भांति कर दिया था। उन्होंने प्रसन्न हो के रावण को अपना वर मांगने को कहा।

रावण ने भगवान शिव से कहा की जिस शिवलिंग पर मेने अपने यह शीश अर्पण किये है मे उस शिव लिंग को लंका मे स्थापित करना चाहता हु आप मुझे इसकी अनुमति दीजिये। भगवान शिव ने रावण को शिवलिंग ले जाने की अनुमति तो दे दी लेकिन एक शर्त भी रखी की अगर शिवलिंग ले जाते समय रावण ने एक भी बार उस शिव लिंग को धरती पर रख दिया वो शिव लिंग वही स्थापित हो जायेगा।

जब रावण शिवलिंग ले के लंका की और प्रस्थान कर चला तो उसे रास्ते मे लघुशंका (पेशाब) की प्रवृति जगी। उसने खुद पर बहोत ही काबू रखने की कोशिश की किन्तु वो उसमे असमर्थ रहा और उसने रास्ते मे जा रहे एक आहिर से बिनती की, की वो कुछ क्षण के लीये इस शिव लिंग को धारण करें वो जल्द ही वापस आके उससे वो शिव लिंग वापस ले लेगा। आहिर के मना करने पर भी रावण ने कैसे भी कार के उसे वो शिव लिंग हाथो मे थमा दिया और वो चला गया। शिव लिंग बहोत ही भारी प्रतीत पड़ रहा था अतः आहिर ने वो शिव लिंग कुछ क्षण सँभालने के पश्चात धरती पर रख दिया। कुछ क्षण के बाद जब रावण वापस आया तो उसने देखा की आहिर ने वो शिव लिंग धरती पर रख दिया है। वो बड़ा ही क्रोधित हुआ लेकिन अब वो कुछ नहीं कर सकता था। उसने उस शिव लिंग को जमीन से हिलाने की बहोत कोशिष की किंतु वो सफल नहीं हो पाया और निराशा के मारे उसने अपना अंगूठा शिव लिंग पर रखते हुए खाली हाथ ही लंका की और प्रस्थान कार गया।

रावण के चले जाने के पश्चात सभी देवतागण, ब्रह्मा और विष्णु वहा उपस्थित हुए और भगवान शिव की विधिवत पूजा की। उन्होंने लिंग मे शिवजी के दर्शन किये और उन्हें प्रणाम कर के वो अपने अपने लोक मे प्रस्थान कर गए।

Baidyanath-Jyotirling-Padurbhav-Katha

कोटि रुद्र संहिता के अनुसार कथा

श्री शिव महापुराण के कोटि संहिता मे भगवान शिव के बैद्यनाथ ज्योतिलिंग की कथा का वर्णन कुछ इस प्रकार से किया हुआ है।

राक्षसराज रावण अभिमानी के साथ साथ अपने अहंकार को तुरंत प्रगट करने वाला था। एक समय की बात है जब वो भगवान शिव के निवास स्थल कैलाश पर्वत पर पूर्ण भक्तिभाव से भगवान शिव की आराधना आरम्भ की। कई वर्ष बीत गए किंतु भगवान शिव रावण की आराधना से प्रसन्न नहीं हुए, अतः उसने अपनी आराधना दूसरी पद्धति से आरम्भ की। इस दूसरी विधि मे राक्षसराज रावण ने सिद्धस्थल हिमालय पर्वत के दक्षिण मे स्थित घने जंगलों के बिच पृथ्वी मे एक बड़ा सा गड्डा खोद कर तैयार किया। तत्परश्चात उस बड़े से गड्डे मे राक्षस कुल भूषण रावण स्वयं बैठ कर अग्नि प्रज्वालित कर के हवन करना आरम्भ कर दिया। उसने भगवान शिव के लिंग का निर्माण कर के अपने स्थान पर ही स्थापित किया हुआ था। भगवान शिव को पूर्ण तरह समर्पित होके उसने तप के लीये कठोर संयम और नियम को धारण किया हुआ था।

वो अपने तप को बहोत कठोर बनाते हुए गर्मी के दिनों मे वो पांच अग्नियो के बिच बैठ कर पंचाग्नि का सेवन करता था, शीतकाल (सर्दियों के समय) मे वो आकंठ (गले से लग कर) जल मे रह कर खड़े हो कर अपनी साधना करता था और वर्षाऋतु मे वो खुले मैदान के चबूतरे पर जाके सोता था। इन तीन कठोर विधियों के अनुसार राक्षसराज रावण की तपस्या चल रही थी किंतु इतनी कठोर साधना के पश्चात भी भगवान शिव उस पर प्रसन्न नहीं हुए। ऐसा माना जाता है की दुष्ट आत्माओ द्वारा भगवान को प्रसन्न करना बड़ा ही कठिन होता है। ऐसी कठोर तपस्या करने के पश्चात भी रावण की सिद्धि प्राप्त नहीं हुई तो उसने अपना एक एक मस्तक काट काट कर भगवान शिव को अर्पण करना शुरू कर दिया। इस प्रकार उसने अपने एक एक करके नौ मस्तक काट के भगवान शिव को समर्पित कर दिए थे। जब वो अपना दसवाँ मस्तक कटाने ही वाला था तब भगवान शिव वहा प्रगट हुए और रावण को अपने साक्षात दर्शन दिए, साथ ही साथ उसके सभी कटे हुए मस्तक को पुनः स्वस्थ कर के पूर्ववत जोड़ दिया।

भगवान शिव ने राक्षसराज रावण को उसकी इच्छा के अनुसार अनुपम बल और पराक्रम प्रदान किया। भगवान शिव का कृपा प्रसाद ग्रहण करने के पश्चात रावण भगवान शिव को पूर्ण रूप से समर्पित होते हुए अपने दोनों हाथ जोड़ कर उनके समक्ष नतमस्तक होके प्रार्थना करता है और कहता है – “है देवेश्वर! आप मुझ पर प्रसन्न होइए मे आपकी शरण मे आया हु और आपसे अपनी स्वर्ण से रचित लंका नगरी मे निवास करने की इच्छा रखता हूँ। आप मेरा यह मनोरथ सिद्ध कीजिये है देवादिदेव!” इस प्रकार से रावण की इच्छा सुन कर भगवान शिव एक दुविधा मे पड़ गए। वो रावण का मंतव्य जान चुके थे, तब उन्होंने उपस्थित हुए धर्म संकट को टालने के लीये अनमने हो कर कहा – “है राक्षसराज! तुम मेरे इस उत्तम लिंग को  पूर्ण श्रद्धाभाव से अपनी लंका नगरी मे ले जाओ किंतु ध्यान रहे अगर तुमने किसी कारण वश इस लिंग को धरती पर रख दिया उस स्थिति मे यह लिंग वही पर स्थापित हो जायेगा, अचल हो जायेगा फिर तुम उसे उस जगा से हिला नहीं पाओगे। अब तुम्हारी जो इच्छा है वैसा करो।

भगवान शिव अपने वचन कह कर वहा से अंतरध्यान हो गए। तब रावण भगवान शिव से वरदान पाके अपने अहंकार मे चूर हो कर “बहुत अच्छा” कह कर भगवान शिव के पवित्र लिंग को अपने हाथो मे लीये वहा से लंका की और प्रस्थान करता है। तभी भगवान शिव की मायाशक्ति से प्रभावित हो कर रावण को बिच रास्ते मे ही मुत्रोत्सर्ग (पेशाब करने) की प्रबल इच्छा जागृत होती है। वैसे तो रावण बड़ा ही धैर्यवान और संयमी था किंतु भगवान शिव की माया के प्रभाव से वो इस मूत्र के वेग को रोक पाने मे असमर्थ था। इसी कारणवश उसने रास्ते से गुजर रहे एक ग्वाले को रोका और उसे समजा बुझा कर उसके हाथो मे शिव लिंग को थामा दिया और खुद मुत्रोत्सर्ग करने के लीये जा बैठा।

वहाँ एक पहर बीत चूका था और अब ग्वाला अपना संतुलन खो रहा था। कुछ पल बिताने के बाद शिवलिंग अति भारी होने की वजह से ग्वाले ने अपना संतुलन खोया और उसने शिव लिंग को जमीन पर रख दिया उसी क्षण रावण वहाँ आया और देखा को ग्वाले ने शिव लिंग को निचे जमीन पर रख दिया है तो उसके होश उड़ चुके थे। अब वो शिव लिंग को उसके स्थान से हिलाने के अथाग प्रयास करने लगा किंतु भगवान शिव के वचननुसार अब वो शिव लिंग वही पर अचल हो चूका था और उसे हिला पाना अब अशक्य था।

रावण के अथाग प्रयासों के बाद भी वो शिव लिंग को वहाँ से हिलाने मे असमर्थ रहा और थक हार के वो वापस अपनी लंका नगरी को प्रस्थान कर गया। लंका पहोच कर उसने हताश मन से अपनी पत्नी मंदोदरी को सारी बात बताई। वंही देवलोक मे भी इस घटना के समाचार प्राप्त हो चुके थे। वहाँ सभी देवगन, ब्रह्मा और विष्णु एकत्रित हो के जिस स्थान पर शिव लिंग को जमीन पर रखा था वहाँ पहुचे और विधिवत भगवान शिव शम्भू के आराधना और पूजा की जिससे प्रसन्न हो कर भगवान शिव ने वहाँ सभी को साक्षात दर्शन दिए।

इस प्रकार लंका नरेश रावण की तपस्या के फल स्वरुप भगवान श्री बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का पादुर्भाव हुआ जिसे स्वयं देवताओ ने प्रतिष्ठित कर के पूजन किया। कहा जाता है यहाँ जो भी मनुष्य श्रद्धा और भक्तिभाव से भगवान शिव की आराधना और विधिवत पूजन करते हुए अभिषेक करता है उसके सभी मानसिक और शारीरिक कष्ट अतिशीध्र नष्ट हो जाते है। इसी कारणवश भगवान बैद्यनाथ के धाम मे रोगियों और शिवभक्तो की विशेष भीड़ दिखाई पड़ती है।

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