पूर्वकाल में दशरथ नामक एक सुप्रसिद्ध चक्रवर्ती राजा हुए थे। राजा प्रजावत्सल थे जिनके कार्य से प्रजा सुखी और समृद्ध जीवन व्यापन कर रही थी। उनके राज्य में सर्वत्र सुख और शांति व्याप्त थी।
उनके राज्य में कई महान ज्योतिषी भी निवास करते थे। एक समय की बात है जब राज्य के ज्योतिषीयो ने शनि को कृतिका नक्षत्र के अंतिम चरण में देख कर कहा की अब यह शनि रोहिणी नक्षत्र का भेदन कर जायेगा। जिसे रोहिणी शकट भेदन भी कहा जाता है।
कहा जाता है शनि ग्रह का रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करना देवता एवं असुर दोनों के लिये अत्यंत ही कष्टदाई होता है। यह पर्व बड़ा ही भयप्रद है कहा जाता है जब भी शनि रोहिणी नक्षत्र का भेदन करते है तब बारह वर्ष का अत्यंत कष्टदाई अकाल पडता है।

राज्य में ज्योतिषीयो द्वारा की जाने वाली इस बात का जोर चारो और फ़ैल रहा था। राज्य की प्रजा भयप्रद और व्याकुल हो उठी थी। जब राजा के दरबार में इस बात का पता चला तब अपनी प्रजा को व्याकुल और अशांत देख राजा दशरथ ने अपने राज्य के प्रमुख ब्राह्मणों और मुनि वशिष्ठ से कहा – “हे मुनिश्रेष्ठ..!!! आप सब जानते है की राज्य में चारो और शनि के रोहिणी शकट भेदन की बात चर्चा और चिंता का विषय बन गई है अतः में आप सभी से इस समस्या का निवारण शीघ्र रूप से चाहता हुँ। “
राजा की बात सुन कर वशिष्ठ मुनिने कहा – “शनि के रोहिणी नक्षत्र में भेदन होने से कोई कैसे बच सकता है भला..!! इस योग के दुष्प्रभाव से तो ब्रह्मा और इंद्रादी देवता भी हमारी रक्षा करने में असमर्थ है।
मुनि वशिष्ठ की बात सुन कर राजा दशरथ अत्यंत चिंता में पड़ गये, वो सोचने लगे की अगर इस संकट का निवारण नहीं किया गया तो सब उन्हें कायर समजेंगे। अतः राजा एक दिन अपना साहस बटोर कर दिव्य धनुष एवं अस्त्रों से सुसज्जित हो कर अपने दिव्य रथ पर सवार हो ते हुए रथ को तेज़ गति से चलाते चन्द्रमा से भी तीन लाख योजन ऊपर नक्षत्र मण्डल में जा पहुंचे।
दिव्य रत्नो एवं मणियों से सुशोभित स्वर्ण निर्मित रथ में बैठे हुए महाबली राजा ने रोहिणी नक्षत्र के पीछे ले जा कर अपने रथ को रोक दिया। श्वेत अश्वो से युक्त और ऊँची ऊँची ध्वजाओ से सुशोभित मुकुट में जेड हुए बहुमूल्य रत्नो से प्रकाशमान राजा दशरथ उस समय आकाश में उपस्थित दूसरे सूर्य के भाँती चमक रहे थे।
शनि को कृतिका नक्षत्र के पश्चात रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करने के लिये इच्छुक देख कर राजा दशरथ क्रोधवश हो कर अपने धनुष पर प्रत्याँचा चढ़ा कर उस पर दिव्या अस्त्र का संधान करते हुए, धनुष की प्रत्याँचा को अपने कानो तक खिंच कर भृकुटिया तान कर शनि के समक्ष डटकर खड़े हो गये।
अपने सामने देव-असुरो के संहारक अस्त्रों से युक्त राजा दशरथ को खड़ा देख कर शनि थोड़ा सा भयभीत हुए और हॅसते हुए राजा से कहने लगे: हे राजेंद्र..!! मेने आज से पहले किसी भी जीव में तुम्हारे जैसा पुरुषार्थ नहीं देखा, क्योंकि देवता, असुर, मनुष्य, सिद्ध, विद्याधर और सर्प जाती के जीव मेरे देखने मात्र से ही भयग्रस्त हो जाते है। हे राजन..!! में तुम्हारे पुरुषार्थ और तपस्या से अति प्रसन्न हुँ। अतः हे रधुकुल नंदन! जो तुम्हारी इच्छा हो वो वर मांगो, में तुम्हे प्रदान करूँगा।
राजा दशरथ ने कहा- (दशरथ उवाच)
हे सूर्यपुत्र शनि देव! यदि आप मुजसे सत्य में प्रसन्न है तो में आपसे एक ही वर मांगना चाहता हुँ की जब तक इस संसार में नदिया, सागर, चन्द्रमा, सूर्य, और पृथ्वी है, तब तक आप इस रोहिणी शकट भेदन कदापि न करें। मैं केवल यही वर मांगता हुँ और मुझे कोई वर नहीं चाहिये।
राजा दशरथ के वर मांगते ही शनिदेव प्रसन्नचित हो कर एवमस्तु कह कर वर दे दिया। इस प्रकार शनि देव से वर प्राप्त कर राजा दशरथ अपने आप को धन्य समझने लगे।
शनिदेव बोले – “है राजन में तुमसे अति प्रसन्न हुँ..!! तुम और भी वर मांग सकते हो..!! तब राजा दशरथ ने शनि देव की इच्छा का अनुमोदन करते हुए दूसरा वर माँगा।
शनि देव कहने लगे – “हे दशरथ, तुम निर्भय रहो..!! आज से 12 वर्ष की अवधि तक तुम्हारे राज्य में कोई अकाल नहीं पड़ेगा। तुम्हरी यश और कीर्ति का गुणगान तीनो लोको में किया जायेगा। शनिदेव से ऐसा वर प्राप्त कर के राजा दशरथ अति प्रसन्न हुआ और अपना धनुषबाण रथ में रखते हुए देवी सरस्वती और भगवान गणेश का ध्यान धर कर शनि देव की स्तुति इस प्रकार करने लगे।
राजा दशरथ ने शनि स्तोत्र के माध्यम से प्रार्थना की – (दशरथ कृत शनि स्तोत्र)
जिनके शरीर का वर्ण भगवान शंकर की तरह कृष्ण तथा नीला है ऐसे भगवान शनि देव को में सादर प्रणाम करता हुँ। इस जगत के लिये कालाग्नि एवं कृतांत रूप शनैश्चर को पुनः पुनः नमन है॥
जिनका शरीर कंकाल जैसा मांस हीन और जिनकी दाढ़ी, मुछ और जटा बढ़ी हुई है, उस शनिदेव को मेरा नस्कार है। जिनके नेत्र बड़े बड़े है और पिठ में सटा हुआ पेट तथा भयानक आकर वाले शनि देव को नमस्कार है॥
जिनके शरीर दिर्ध है, जिनके रोए बहोत मोटे है, जो लम्बे चौड़े किन्तु जर्जर शरीर वाले है, तथा जिनकी दाढ़ें कालरूप है, उन शनिदेव को बार बार नमन है॥
हे शनिदेव! आपके नेत्र कोटर के समान गहरे है, आपकी ओर देखना कठिन है, आप रोद्र, भीषण और विकराल हैं, आपको सादर नमस्कार हैं॥
हे सूर्यनन्दन, भास्कर पुत्र और अभय प्रदान करने वाले देवता, वलीमुख आप सबकुछ भक्षण करने वाले हैं, ऐसे शनिदेव को सत सत नमन हैं॥
आपकी दृष्टी अधोमुखी हैं आप संवर्तक, मंदगति से चलने वाले तथा जिसका प्रतिक तलवार के समान हैं, ऐसे शनिदेव को पुनः पुनः नमस्कार हैं॥
अपने तपस्या से अपनी देह को दग्ध कर लिया हैं, आप सदा योगाभ्यास में तत्पर, भूख से आतुर और अतृप्त रहते हैं। आपको सर्वदा सर्वदा नमस्कार हैं॥
जिसके नेत्र ही ज्ञान हैं, काश्यपनंदन सूर्यपुत्र शनिदेव आपको नमस्कार हैं। आप संतुष्ट होने पर वर में राज्य देते हैं और रुष्ट होने पर तत्क्षण क्षीण लेते हैं वैसे शनिदेव को नमस्कार हैं॥
देवता, मनुष्य, असुर, विद्याधर, सिद्ध और नाग – ये सब बस आपकी दृष्टी पड़ने पर समूल नष्ट हो जाते हैं, ऐसे शनिदेव को सत सत नमन हैं॥
आप मुझ पर प्रसन्न होइए। मैं वर पाने के योग्य हुँ और आपकी शरण में आया हुँ॥ राजा दशरथ के इस प्रकार प्रार्थना करने पर सूर्य-पुत्र शनैश्चर बोले –
हे उत्तम व्रत के पालक राजा दशरथ। में तुम्हारी इस स्तुति से भी अत्यंत प्रसन्न हुआ हुँ। अतः हैं रघुनन्दन तुम मुजसे अपनी इच्छानुसार वर मांगो में तुम्हे अवश्य दूंगा।
दशरथ उवाच-
प्रसन्नो यदि मे सौरे !
वरं देहि ममेप्सितम् ।
अद्य प्रभृति-पिंगाक्ष !
पीडा देया न कस्यचित् ॥
अर्थात प्रभु! आज से आप देवता, असुर, मनुष्य, पशु, पक्षी तथा नाग-किसी भी प्राणी को पीड़ा न दें। बस यही मेरा प्रिय वर है॥
शनिदेव ने कहा –
हे राजेंद्र, वैसे इस प्रकार का वरदान में किसी को नहीं देता हुँ, किन्तु में आज तुम्हारी स्तुति से अत्यंत संतुष्ट हुँ इस लिये में तुम्हे दे रहा हुँ।
हे दशरथ, तुम्हारे द्वारा कहे गये इस स्तोत्र को जो भी मनुष्य, देव या असुर, सिद्ध या विद्वान आदि पढ़ेंगे, उन्हें शनि के कारण कोई बाधा नहीं होंगी। जिनके महादशा, अंतर्दशा में, गोचर में अथवा लग्न स्थान, द्वितीय, चतुर्थ, अष्टम या द्वादश स्थान में शनि हो वे व्यक्ति यदि पवित्र होकर प्रातः, मध्याह्न और सांय काल के समय इस स्तोत्र को ध्यान देकर पढ़ेंगे, उनको में निश्चित रूप से में पीड़ित नहीं करूँगा।







