मोक्षदा एकादशी व्रत कथा सम्पूर्ण – Mokshada Ekadashi Vrat Katha Sampurn In Hindi [2026]

मोक्षदा एकादशी 2026 कब है? (Mokshada Ekadashi kab hai?)

समर्थ / वैष्णव / इस्कॉन / गौरिया – 20 दिसम्बर 2026, रविवार (स्थल – मुंबई, महाराष्ट्र)
व्रत तोड़ने(पारण) का समय – 21 दिसम्बर 2026 सुबह 07.12 मिनट से सुबह 09.21 मिनट तक

मोक्षदा एकादशी तिथि (Mokshada Ekadashi Tithi)

प्रारंभ – 19 दिसम्बर 2026 शनिवार रात 10.09 मिनट से
समाप्ति – 20 दिसम्बर 2026 रविवार रात 08.14 मिनट तक

Mokshada Ekadashi

मोक्षदा एकादशी का महात्मय (Mokshada Ekadashi Ka Mahatmay)

भगवान श्री हरि कृष्ण के मुख्य से उत्पन्ना एकादशी की कथा एवं महत्मय सुन राजा युधिष्ठिर बोले –

युधिष्ठिर – “हे कमलनयन..!! आपके श्री मुख से मागशीर्ष माह के कृष्णपक्ष को आनेवाली उत्पन्ना एकादशी व्रत की कथा एवं महात्म्य सुन में तृप्त हो गया हूं और अब में मार्गशीष माह के शुक्लपक्ष को आनेवाली एकादशी के विषय में जानने को उत्सुक हूं। अतः ही केशव इस एकादशी को किस नाम से जाना जाता है? इस एकादशी का क्या महात्मय है? इस एकादशी व्रत का क्या विधि विधान है? इस एकादशी के फल स्वरूप हमें किन पुण्यफल की प्राप्ति होती है? यह मुझे विस्तार पूर्वक बताने की कृपा करें।

श्री कृष्ण – “हे धर्मराज, मार्गशीष माह के शुक्लपक्ष को आनेवाली एकादशी को मोक्षदा एकादशी(Mokshada Ekadashi) के नाम से जाना जाता है। यह एकादशी परम पाप नाशनी और मोक्ष प्रदान करने वाली है। इस एकादशी व्रत से मनुष्य को सहज रूप से मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है और चिंतामणि के समान सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है। इस एकादशी व्रत से आप अपने पूर्वजों के सभी कष्टों का नाश कर सकते है। हे राजन अब में। तुम्हें इस एकादशी व्रत की कथा सुनाने जा रहा हूं इसे ध्यान पूर्वक सुनना।”

मोक्षदा एकादशी व्रत कथा (Mokshada Ekadashi Vrat Katha)

प्राचीनकाल में एक गोकुल नामक नगर हुआ करता था। राजा वैखानस वहा राज किया करते थे। उसके राज्य में सर्वत्र सुख और समृद्धि का निवास था। उसके राज्य में चारो वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण निवास करते थे। एक दिन राजा को रात्रि में एक स्वप्न आया। स्वप्न में राजा ने अपने पिता को नर्क में दुःख भोगते हुए देखा। यह स्वप्न देख राजा बड़े ही विचलित हो उठे।

प्रातः होने पर वह सभी विद्वान ब्राह्मणों के पास गए और अपने स्वप्न के विषय में बताया और कहा –

राजा – “मैंने अपने स्वप्न में अपने पूज्य पिता को नर्क में कष्ट भोगते हुए देखा है। उन्होंने कहा था; हे पुत्र में यहाँ नर्क में अपने दुःख भोग रहा हु अतः तुम मुझे यहां से मुक्त कराओ। जबसे यह स्वप्न देखा है तबसे में बहोत ही बैचेन रहने लगा हुं। चित्त में बड़ी ही अशांति की अनुभूति हो रही है। अब मुझे इस राज्य, पुत्र, स्त्री, घोड़े, हाथी आदि में सुख की अनुभूति ही नहीं हो रही। अतः हे ब्राह्मण गण अब आप ही मेरी इस समस्या का समाधान निकले। कोई व्रत, पूजा, अनुष्ठान, तप, दान आदि ऐसा कोई उपाय जिससे में अपने पूज्य पिता को नरकाग्नि से मुक्त करवा सकू। उस पुत्र का जीवन सदैव व्यर्थ माना जाता है जो अपने माता पिता का उद्धार ना कर सके। वह एक ही पुत्र पर्याप्त है जो अपने सत कर्मो से अपने माता पिता एवं अपने पूर्वजों का उद्धार कर सके उन हजारों मूर्ख पुत्रों की तुलना में। जैसे की एक चंद्रमा रात्रि के अंधकार में संपूर्ण जगत में प्रकाश बांटता है किंतु हजारों तारे यह नहीं कर सकते।”

सभी ब्राह्मण ध्यानपूर्वक राजा की व्यथा को सुन भाव विभोर हो कर बोले –

ब्राह्मण – “हे राजन, आपका विचार पूर्णरूप से उत्तम है। आपकी समस्या के समाधान हेतु यहां पास ही भूत, भविष्य और वर्तमान के ज्ञाता ऐसे ऋषि पर्वत का आश्रम आया हुआ है। आपकी समस्या का हल वह ही से सकते है।”

ब्राह्मण गण की बात सुन राजा ऋषि पर्वत के आश्रम पहुंचे। वंहा पहुंच कर उन्होंने देखा की यहाँ बड़े बड़े तपस्वी मुनि अपनी साधना में लीन थे। उन्हीं के बिच उनको ऋषि पर्वत के दर्शन प्राप्त हुए। राजा उनके समक्ष पहुंचे और उन्हें साष्टांग नमस्कार किआ। ऋषि पर्वत ने भी राजा को आशीर्वाद देते हुए उनके कुशल मंगल पूछे। उत्तर में राजा ने कहा –

राजा – “हे मुनिश्रेष्ठ..!! आपकी कुर्पा से मेरे राज्य में सब कुशल मंगल है किन्तु अकस्मात मेरे चित को किसी अगम्य अशांति ने घेर रखा है। में यंहा उसी अगम्य अशांति का समाधान ढूंढने आया हुआ हुँ। राजा की बात सुन कर ऋषि पर्वत ने अपने तापबल से अपनी आँखे बंध करते हुए राजा के भूतकाल को देखने लगे, और फिर बोले –

ऋषि पर्वत – “हे राजन, मेने अपने तपोबल से तुम्हारे पिता के पूर्व जन्म के कुकर्मो को देख लिया है। उन्होंने पूर्व जन्म में कामातुर होकर एक पत्नी को रति दी किंतु सौत के कहने पर दूसरे पत्नी को ऋतुदान माँगने पर भी नहीं दिया। इसी पापकर्म वश तुम्हारे पिता को नर्क में जान पड़ा।

ऋषि पर्वत की बात सुन राजा बोले –

राजा – “हे मुनिवर..!!! में अपने पिता के पापकर्म के निवारण हेतु कोई भी उपाय हो करने को सज्ज हुँ।”

मुनि बोले –

ऋषि पर्वत – “हे राजन, आनेवाली मागशीर्ष माह के शुक्लपक्ष की एकादशी(Mokshada Ekadashi) का व्रत रखे और उस व्रत से जो भी पुण्य अर्जित होता है उसे अपने पिता को अर्पित कर दे। इस व्रत  के प्रभाव से निश्चित रूप से आपके पिता को नर्क लोक से मुक्ति प्राप्त होंगी।”

ऋषि पर्वत की बात सुन राजा तुरंत अपने राज्य को लौट आये और आनेवाली मागशीर्ष माह के शुक्लपक्ष की एकादशी का व्रत अपने सर्व कुटुंबी जनो सहित किआ और पूर्ण श्रद्धाभाव से रात्रि जागरण करते हुए इस व्रत का समापन किआ। इस व्रत से जो भी पुण्यफल अर्जित हुआ उसे ब्राह्मणो की उपस्थिति में हाथ में जल ले कर संकल्प करते हुए अपने पिता को अर्पित कर दिया। पुत्र द्वारा किये जाने वाले इस एकादशी व्रत के पुण्यफ़ल से राजा के पिता स्वर्गलोक को प्राप्त हुए और कहने लगे – “हे पुत्र तुम्हारा सदैव कल्याण हो” और उन्हें नर्क के सभी कष्टों से भी मुक्ति मिली। अंत समय में राजा भी अपने पुण्यफ़ल को अर्जित करते हुए भगवान श्री हरी के परम धाम वैकुंठ को गया।

मागशीर्ष माह के शुक्लपक्ष को आनेवाली मोक्षदा एकादशी(Mokshada Ekadashi) का व्रत जो भी मनुष्य अपनी पूर्ण श्रद्धा से करता है उसके सभी पाप नष्ट हो जाते है। पुरे संसार में मोक्ष की प्राप्ति करने हेतु इस व्रत से अधिक और कोई व्रत नहीं है। इसी एकादशी पर्व पर गीता जयंती भी मनाई जाती है और यही नहीं यह धनुर्मास की एकादशी भी कहलाई जाती है। इसी वजह से इस एकादशी का महत्त्व और भी बढ़ जाता है। इसी दिन से गीता पाठ का अनुष्ठान प्रारम्भ होता है अतः हर मनुष्य को प्रति दिन कुल समय के लिए गीता का पाठ अवश्य करना चाहिये।

हे धर्मराज…!!! इसी प्रकार से इस एकादशी(Mokshada Ekadashi) का व्रत करने वाले मनुष्य के सारे पापो का नाश होता है और इस एकादशी के पुण्यफ़ल से मनुष्य अपने साथ साथ अपने पूर्वजो को भी स्वर्गलोक की प्राप्ति करवा सकता है।

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