परमा एकादशी 2026 कब है? (Parama Ekadashi kab hai?)
समर्थ / वैष्णव / इस्कॉन / गौरिया – 11 जून 2026, गुरूवार (स्थल – मुंबई, महाराष्ट्र)
व्रत तोड़ने(पारण) का समय – 12 जून 2026 सुबह 05:53 मिनट से सुबह 08:34 मिनट तक
परमा एकादशी तिथि (Parama Ekadashi Tithi)
प्रारंभ – 11 जून 2026 गुरूवार सुबह 12:57 मिनट से
समाप्ति – 11 जून 2026 गुरूवार रात 10:36 मिनट तक
परमा एकादशी का महात्मय (Parama Ekadashi Ka Mahatmay)
धनुर्धर अर्जुन ने कहा – हे माधव..!!! आपके श्री मुख से अधिक माह के शुक्ल पक्ष को आनेवाली एकादशी का महात्मय सुन कर में कृतार्थ हो गया। अब मुझे अधिक माह के कृष्ण पक्ष को आनेवाली एकदशी की कथा सनुनने की लालसा उत्पन्न हुई है आ[ मुज पर कृपा करे और मुझे बताईये उस एकादशी का नाम क्या है? उसके व्रत अनुष्ठान की क्या विधि है? और उसका व्रत करने से किस पुण्यफल की प्राप्ति होती है।
तब श्री कृष्ण बोले – हे पार्थ..!! अधिक माह के कृष्ण पक्ष को आनेवाली एकादशी तिथि को परमा एकादशी कहा जाता है। वैसे तो प्रति वर्ष 24 एकदशी होती है। किन्तु अधिकमास या मलमास को जोड़ कर ये संख्या 26 हो जाती है। अधिक मास में दो एकादशिया होती है, जो पद्मिनी एकादशी (शुक्ल पक्ष) और परमा एकादशी (कृष्ण पक्ष ) के नाम से जानी जाती है।

इन एकादशी का व्रत करने मात्र से मनुष्य के सभी पापो का हनन होता है और वो इस लोक में सुख भोग कर परलोक में सद्दगति प्राप्त करता है। इन एकादशी का व्रत विधिविधान पूर्वक करना चाहिए और भगवान श्री हरी विष्णु का धुप, दीप, पुष्प, नैवेध आदि से पूजन करना चाहिए।
अब में तुम्हे इस एकादशी की पावन कथा का वर्णन करने जा रहा हु जो महर्षियों के साथ काम्पिल्य नगरी में हुई थी, अतः तुम इसे ध्यानपूर्वक सुनना।
परमा एकादशी व्रत कथा (Parama Ekadashi Vrat Katha)
एक समय की बात है काम्पिल्य नगरी में सुमेधा नाम से एक अत्यंत धर्मशील ब्राह्मण रहा करता था। उसकी पत्नी अत्यंत पवित्र और पतिव्रता थी। दोनों पूर्व जन्म के किसी पाप के कारण अत्यंत दरिद्रता का जीवन व्यतीत कर रहे थे।
समय इतना कठोर बिट रहा था की दोनों की विपत्तिया कम होने का जैसे नाम नहीं ले रही थीइ ब्राह्मण को भिक्षा मांगने पर भी दान नहीं मिल रहा था। ब्राह्मण की पत्नी वस्त्रहीन होने पर भी अपने पति की सेवा कर के पतिव्रत धर्म का पालन कर रही थी, वो खुद भूखी रहती थी किन्तु द्वार पर आये हुए भिक्षुक या अतिथि को अन्न का दान किया करती थी। इतने कष्ट सहने पर भी अपने पति से कोई मांग नहीं किया करती थी। वो अपनी पूर्ण श्रद्धा, मन कर्म वचन से अपने पति की सेवा किया करती थी। इस प्रकार दोनों पति-पत्नी घोर निर्धनता का जीवन व्यतीत कर रहे थे।
एक दिन ब्राह्मण ने अपनी भार्या से कहा – “हे प्रिये..!!! इस नगर में भिक्षा मांग कर अपना जीवन निर्वाह करना अति कष्ट दायक हो रहा है। में जब भी किसी धनवान के घर भिक्षा मांगने जाता हु तो मुझे भिक्षा नहीं मिल रही है। जीवन एक कटु सत्य यह है की गृहस्थी बिना धन के व्यतीत नहीं हो सकती, अतः अगर तुम्हारी सहमती हो तो में परदेस जा कर काम करना चाहता हु, क्योंकि विद्वानों ने कर्म की प्रशंसा की है।
ब्राह्मण की पत्नी ने विनीत भाव से कहा – “हे स्वामी..!! में तो आपकी दासी हूँ..!! आपकी आज्ञा और आपके विचारो का सन्मान करना ही मेरा परम धर्म और कर्तव्य है। अतः है नाथ..!! इस मृत्युलोक में मनुष्य अपने पूर्वजन्मो के कर्मो का फल भोगने ही आता है। सुमेरु पर्वत पर रह कर भी मनुष्य को स्वर्ण की प्राप्ति नहीं हो पाती, यह सब भाग्य का की खेल है। जो भी मनुष्य अपने पूर्व जन्म में विद्या और भूमि का दान करता है उसे इस जन्म में विद्या और भूमि प्राप्त होती है। ईश्वर ने हमारे भाग्य में जो कुछ भी लिखा है उसे टाला नहीं जा सकता।
“है नाथ…!!! यदि कोई मनुष्य दान नहीं करता तो प्रभु उसे केवल अन्न ही देते है, इसलिए आपको इसी स्थान पर रह कर प्रयास करते रहना चाहिए, क्योंकि मे आपका विछोह सेह नहीं सकती। पति बिना इस संसार मे उसके माता, पिता, भाई, बहन, ससुर तथा आदि सम्बन्धी निंदा किया करते है। अतः है स्वामी.. आप और कंही ना जाइये, आप यही रहिये अगर आपको भाग्य मे होगा तो आपको यही सब कुछ स्वतः ही प्राप्त हो जायेगा।”
ब्राह्मण अपनी स्त्री की बात सुन कर कंही और न जाने का मन बना लेता है। ऐसे ही समय बीतता जाता है और एक दिन उस नगर मे ऋषि कौण्डिन्य वहा आये..
धर्मात्मा ऋषि को अपने आंगन मे पा कर ब्राह्मण दम्पति ने उन्हें प्रणाम किया और कहा – “है महात्मा..!!! आज हम आपके दर्शन पा के धन्य हो गये। आप जैसे परमात्मा स्वरुप महर्षि का आगमन हमारे द्वार पर होना निश्चित रूप से हमारे लिए शुभ संकेत के समान है..!!!”
दोनों ने ऋषि को सहर्ष अपने घर मे बुलाते हुए उन्हें आसान दिया। अपने पास जो कुछ भी अन्न था उसे पका कर उन्हें भोज अर्पित किया। भोजन ग्रहण करने के पश्चात दोनों ऋषि के सानिध्य मे बैठे और वार्तालाप करने लगे। ब्राह्मणी ने ऋषि से आदरभाव से पूछा – “है ऋषिवर..!! आप से कुछ नहीं छीपा आप तो अपने भक्तो की समस्या को भली भांति समझ जाते है। फिर भी मे आपसे आज अपनी इस दरीद्रता के निवारण हेतु उपाय जानने की इच्छुक हूँ। हम ऐसा क्या करें की हमें भी इस दरिद्र जीवन से मुक्ति मिले। मेने अपने पति को परदेस जा कर धन कमाने से रोका है। आज यह मेरा भाग्य ही है की आप मेरे द्वार पर पधारे हो। मुझे पूर्ण विश्वास है की आज आपसे मिले ज्ञान वचनो से मेरी इस दरिद्रता का निश्चित रूप से निवारण हो जायेगा। अतः है महर्षि आप हमें इस दरिद्र जीवन से मुक्ति प्राप्त करने का कोई उपाय बतलाइये।”
ब्राह्मणी के वचन सुन कर ऋषि कौण्डिन्य बोले – “है ब्राह्मणी..!!! मल मास के कृष्ण पक्ष को आने वाली परमा एकादशी आपकी इस दरिद्रता का निवारण करने मे सक्षम है। जो भी मनुष्य इस एकादशी का व्रत करता है उसके सभी पाप, दुःख और दरिद्रता नष्ट हो जाते है। इस एकादशी का व्रत करने वाला अपने जीवनकाल मे धनवान बन जाता है। इस व्रत का अनुष्ठान नृत्य, गायन और रात्रि जागरण करके करना चाहिए..
… यह एकादशी ना केवल जातक को धन और वैभव प्रदान करती है बल्कि जातक के सभी पापो का नाश करके उसे उत्तम गति भी देती है। धनाधीपति कुबेर ने भी इसी एकादशी व्रत का पालन किया था जिसके चलते महादेव ने प्रस्सन हो कर उन्हें धनाध्यक्ष का पद प्रदान किया था। ये इसी व्रत का प्रभाव है जिसके चलते राजा हरिश्चन्द्र को पुत्र, स्त्री और राज्य की प्राप्ति हुई थी।”
अगर आपके भी आराध्य देव श्री गणेश है और आप उनकी पवित्र संकट नाशक संकष्टी चतुर्थी का व्रत करते है तो आपको अषाढ़ संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत कथा सम्पूर्ण की कथा जरूर पढ़नी चाहिए..
तत्परश्चात ऋषि कौण्डिन्य ने उन्हें इस एकादशी व्रत करने का सम्पूर्ण विधान कह सुनाया। महर्षि ने कहा – “है ब्राह्मणी..!! पंचरात्रि व्रत इससे भी अति उत्तम व्रत माना जाता है। परमा एकादशी के दिन प्रातः अपने नित्य कर्म से निवृत हो कर व्रत धारक को इस व्रत का आरम्भ करना चाहिए।
जो भी मनुष्य पांच दिनों तक निर्जल हो कर इस व्रत का अनुष्ठान करता है वो अपने माता-पिता और स्त्री सहित स्वर्ग लोक को प्राप्त करता है। जो भी मनुष्य इस व्रत का अनुष्ठान कर के केवल संध्या को भोजन करता है वो स्वागलोक का भागी बनाता है। इस व्रत में जो कोई भी मनुष्य प्रातः स्नान कर के ब्राह्मणों को भोजन करवाते है उन्हें समस्त संसार को भोजन करवाने का फल प्राप्त होता है। यही नहीं जो भी मनुष्य इस व्रत में यथा समर्थ अगर अश्व का दान करते है उन्हें तीनों लोकों को दान करने का फल प्राप्त होता है। जो भी मनुष्य इस व्रत में उत्तम ब्राह्मण को तिल का दान करते है उन्हें तीन की संख्या के बराबर विष्णुलोक में निवास करने का फल प्राप्त होता है। जो भी मनुष्य इस व्रत की अवधि में घी के पत्र का दान करते है वो सूर्यलोक को प्राप्त करते है। जो भी मनुष्य इस व्रत में पूर्णतः ब्रह्मचर्य का पालन करते है वो अंत में देवांगनाओ के साथ स्वर्ग लोक में जाते है। अतः हे ब्राह्मणी तुम अपने पति के साथ इसी परम हितकारी व्रत का अनुष्ठान करो निश्चित रूप से तुम्हारी सारी मनोकामनाएं सिद्ध होगी और तुम अंत में अपने पति के साथ स्वर्ग लोक को जाओगी।
कौण्डिन्य ऋषि के कथनानुसार दोनों ने परमा एकादशी (Parama Ekadashi) के पांच दिन के व्रत का अनुष्ठान किया। व्रत की पूर्णाहुति पर ब्राह्मणी ने अपने द्वार पर एक राजकुमार को आते हुए देखा।
राजकुमार ने ब्रह्माजी की प्रेरणा से एक उत्तम घर जो सभी सुख सुविधाओं से परिपूर्ण था उन्हें रहने के लिए दिया। इस प्रकार से ब्राह्मण और ब्राह्मणी की दरिद्रता का अंत हुआ और अपने जीवनकाल के अंत तक पृथ्वीलोक में सभी सुखों को भोगते हुए अंत में विष्णुलोक को प्रस्थान कर गए।







