महाभारत के युद्ध में भोजन प्रबंधन (Mahabharat Ke Yuddh Main Bhojan Ka Prabandhan)

अगर हम आज अपने बीते हुए इतिहास को टटोले तो आप शायद इस बात से इनकार नहीं कर पाएंगे की महा भारत ही विश्व का सबसे पहेला महायुद्ध था। शायद ही कोई एसा प्रदेश या क़स्बा रहा होगा जिसके राजा ने इस महा युद्ध में हिस्सा न लिया हो।

समस्त आर्याव्रत के राजाओ यांतो पांडवो के पक्ष में यातों कौरवो के पक्ष में उपस्थित रह कर इस युद्ध में शामिल हुए थे केवल भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई बलरामजी और रुक्मी ही ऐसे थे जिन्होंने इस महायुद्ध में हिस्सा नहीं लिया हुआ था। हम सब कम से कम ये तो जानते ही है।

किन्तु इन सब के बिच में एक राज्य ऐसा भी था जो युद्ध क्षेत्र में उपस्थित तो था किन्तु युद्ध से विरत था और वो राज्य था दक्षिण का उड़पी राज्य।

जब दक्षिण क्षेत्र के उड़पी राज्य के राजा युद्ध क्षेत्र में पहुंचे तो कौरवो और पांडवो दोनों उन्हें अपने पक्ष में जोड़ने के लिए प्रयास करने लगे।

उड़पी के राजा अति प्रभावशाली और दूरदर्शी थे। उन्हें इस युद्ध के परिणाम का आभास हो चूका था। अतः उन्होंने वहा उपस्थित भगवान श्री कृष्ण से बात की और कहा – “हे केशव..!!! में ने दोनों पक्ष की बात सुनी और दोनों पक्ष इस युद्ध में हमें संलित करने हेतु अति लालायित प्रतीत हो रहे है किन्तु दोनों पक्षों में से किसी ने भी यह सोचा है की युद्ध के दौरान दोनों और से उपस्थित इतनी विशाल सेना के भोजन का प्रबंध कैसे होगा?

भगवान श्री कृष्ण उड़पी के राजा की बात सुन कर मुस्कुराये और कहा – “हे राजन.!! आपके सर्वथा उचित सोचा है। मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है की अगर आपने इस बात को मेरे समक्ष रखा है तो आपके पास इस समस्या को लेके कोई पूर्व योजना जरूर होगी। अगर ऐसा है तो कृपा कर के आप मुझे वो बताये।

Mahabharat Ke Yuddh Main Bhojan Ka Prabandhan

भगवान श्री कृष्ण की बात का समर्थन करते हुए उड़पी के राजा ने कहा – “हे माधव..!!! ये बिलकुल सत्य है। भ्राताओ के बिच हो वाले इस महा युद्ध को में समर्थन देने में अपने आप को असमर्थ पा रहा हु। अतः इस युद्ध में भाग लेने की मेरी कोई इच्छा नहीं है।

किन्तु में ये भली भांति जनता हु की अब इस युद्ध को टाला नहीं जा सकता अतः मेरी ये इच्छा है की में अपनी पूरी सेना के साथ यहाँ उपस्थित समस्त सेना के भोजन का प्रबंध करू।

जब श्री कृष्ण ने राजा का परामर्श सुना तो वो बड़े ही हर्षित हो उठे और कहा – ” हे राजन..!!! मैं आपकी बात का समर्थन करता हूँ। इस युद्ध में लगभग ५०००००० (50 लाख) योद्धा भाग लेंगे और अगर आप जैसे कुशल उनके भोजन की संपूर्ण व्यवस्था देख्नेगे तो अवश्य ही हम अपनी और से निश्चिंत हो जायेंगे।

और देखा जाए तो सागर जैसी इस विशाल सेना के भोजन का प्रबंधन करना आपके और भीमसेन के अतिरिक्त किसी भी योद्धा के बस की बात नहीं है।

भीमसेन इस युद्ध से विरत नहीं हो सकते अतः आपसे मेरी यह प्रार्थना है की आप अपनी सेना सहित दोनों ओर की सेना के भोजन का कारभार संभाले। भगवान श्री कृष्ण के परामर्श को सहमति देते हुए उड़पी के राजा ने संपूर्ण भोजन व्यवस्था का भार संभाल लिया।

युद्ध के पहले दिन ही राजा ने उपस्थित सभी योद्धाओ के भोजन का प्रबंध किया। उनकी कुशलता का प्रमाण इस प्रकार लगाया जा सकता है की दिन के अंत में जितने योद्धाओ के भोजन का प्रबंध किया हुआ था उतने ही योद्धा के लिए पर्याप्त भोजन परोसा गया और अन्न का एक भी अतिरिक्त दाना बर्बाद नहीं हुआ।

अब जैसे जैसे युद्ध आगे बढ़ता गया वैसे वैसे योद्धाओ की संख्या भी कम होती गई। दोनों पक्ष के योद्धा ये देख कर हमेशा आश्चर्य चकित रहते की हर दिन के अंत में उड़पी नरेश केवल उतने ही योद्धाओ का भोजन बनवाते जितने योद्धा वंहा वास्तव में उपस्थित रहते थे।

किसी को भी इस चमत्कार का पता नहीं चल पा रहा था की उड़पी नरेश को कैसे इस बात का पता चल जाता था की आज कितने योद्धा दिन के अंत में शेष रहने वाले है और उन योद्धाओ के हिसाब से उनके भोजन की व्यवस्था की जाए।

सभी योद्धा गन ये चमत्कार देख कर चकित थे की इतने विशाल सेना का भोजन समय सीमा में तैयार करना और वो भी अन्न का एक भी दाना बर्बाद किये बिना यह सब के लिए आश्चर्य का विषय था।

अंततः युद्ध समाप्त हुआ और पांडवो की विजय हुई। अपने राज्याभिषेक के दिन आखिरकार धर्मराज युधिष्ठिर से रहा नहीं गया और उन्होंने उड़पी नरेश से पूछ लिया –

“हे महाराज.!!! आज समस्त जगत में हमारी प्रशंसा की जा रही है की इतनी कम सेना होने के पश्चात भी हमने उस सेना को परास्त कर दिया जिनका नेतृत्व भीष्म पितामह, गुरु द्रोण और हमारे जयेष्ठ भ्राता कर्ण जैसे महारथी कर रहे थे।

किन्तु मुझे ये लगता है की हम सब से अधिक प्रशंसा के पात्र तो आप है जिन्होंने इतने कम समय में इतनी बड़ी सेना के लिए भोजन का प्रबंध किया अपितु हर दिन के अंत में उतनी ही मात्र में अन्न बनाया गया जिससे अन्न का एक अतिरिक्त दाना भी व्यर्थ ना हो पाया। में आपसे ये निवेदन करता हु की आप अपनी इस कुशलता का रहस्य मुझे बताने की कृपा करे।

युधिष्ठिर की बात सुन कर उड़पी नरेश मुस्कुराये और कहने लगे – “हे सम्राट…!!!! में अवश्य ही आपनी इस कुशलता का रहस्य आपको बताऊंगा किन्तु उससे पहेले में आपसे ये पूछना चाहता हु की आप इस युद्ध में विषय प्राप्त करने का श्रेय किसी देना चाहेंगे।”

उड़पी नरेश की बात का उत्तर देते हुए युधिष्ठिर ने कहा – “हे महाराज..!!! आप सर्व ग्यानी है अतः आप ये जानते ही होंगे की भगवान श्री कृष्ण के अतिरिक्त इस युद्ध में विजय प्राप्ति करने के श्रेय किसी और को नहीं जा सकता है। अगर श्री कृष्ण हमें उचित मार्गदर्शन न देते तो कौरवो की इस विशाल सेना को परास्त कर पाना हमारे लिए असंभव था।

तब बिना विलंब किये उड़पी सम्राट ने कहा की – “हे महाराज..!!! आप जिसे मेरा चमत्कार बता रहे है वो भी भगवान श्रीकृष्ण की ही लीला है।” यह सुन कर वह उपस्थित सभी आश्चर्यचकित हो गए।

तब उड़पी नरेश ने इस रहस्य से सबको अवगत करवाते हुए कहा – “हे महाराज..!!! श्री कृष्ण युद्ध के दौरान प्रतिदिन रात्रि को मूंगफली खाया करते थे।

में प्रतिदिन भगवान श्री कृष्ण के शिविर में जा कर गईं कर मूंगफली रखता था और उनके खाने के पश्चात दुबार उनके शिविर में जाते देखता था की आज प्रभु ने कितनी मूंगफली का सेवन किया हुआ है।

मेने देखा की प्रभु जीतनी मूंगफली खाते थे उसके अगले दिन उसके ठीक 1000 गुना सैनिक युद्ध में मारे जाते थे। अर्थात अगर वो 50 मूंगफली खाते थे तो में जान जाता था की अगले दिन युद्ध में ५०००० योद्धा मारे जाने वाले है।

अतः में उसी अनुपात में मै अगले दिन का भोजन कम बनाया करता था। यही कारण है की कभी भी मेरा बनाया हुआ भोजन व्यर्थ नहीं गया। उड़पी नरेश की इस बात को चुन कर सभी भगवान श्री कृष्ण के समक्ष नत मस्तक हो गए।

यह कथा महाभारत की सभी दुर्लभ कथाओ में से एक मानी जाती है। कर्णाटक के उड़पी जिले में स्थित कृष्ण मठ में ये कथा हमेशा सुनाई जाती है।

कहा जाता है अपने जीवन काल में कृष्ण मठ की स्थापन उड़पी नरेश ने ही करवाई थी जिसे आगे जाके माधवाचार्य ने आगे बढाया।

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